अनंग त्रयोदशी – Kamadev Anang Sadhana
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शांकुम्भरी जयंती – कामदेव अनंग साधना
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Kamadev Anang Attraction Sadhana
व्यक्ति जीवन में पूर्ण वैवाहिक सुख भोगने हेतु।
पौरूषता से भरे लबालब शरीर की प्राप्ति। आंखों में आकर्षण का भाव, झुर्रियों का मिट जाना। बालों का काला हो जाना। कद-काठी का भी आकार प्रकार बदलने में सहायक यह कामदेव साधना।
[Image: Jai Gurudev] जीवन में पूर्ण पौरूषता का तात्पर्य है प्रबल व बिजली की तरह कड़कता हुआ व्यक्तित्व, जिसकी आंखें देखकर ही सामने वाले की आंखें झुक जायें। पूर्ण पौरूषता का तात्पर्य है, जोश और मर्दानगी से भरा उभरा हुआ विशाल वक्ष स्थल, जिसकी गठन देखकर स्त्रियों की आंखों में स्वप्न तैर जाय, उसमें जा समाने का। पूर्ण पौरूषता का तात्पर्य है एक ऐसा व्यक्तित्व जो सभी खतरों से जूझने का हौसला रखता हो। जिसमें चुनौती देने व चुनौती लेने का भाव हो। ऐसे प्रबल पौरूष से भरे सौन्दर्य का स्वामी हजारों हजारों की भीड़ में भी अलग खड़ा दिखाई देता है जिसके ऊपर मस्ती से हवा की कोई लहर आ कर उसके चौडे़ मस्तक पर घुंघराले वालो को बिखेर रही हो, और जिसकी गठी मांस-पेशियों पर उभर कर जाती हुई नसे गर्व से घोषणा कर रही हो, कि इसकी रगों में रक्त नहीं, पिघला सीसा ही बह रहा है।
अब तो पौरूषता के नाम पर पुरूषोचित सौन्दर्य इसी प्रकार दुर्लभ हो गया है जैसे नारी सौन्दर्य। नारियां है तो निस्तेज सी, ढले वक्ष स्थल लिये, पेट, और कूल्हों पर चर्बी की कई पर्तें रखे, उन चर्बियों की पर्तों को ही नहीं जीवन को भी ढो रही हैं। पुरूष वर्ग पान, गुटका, सिगरेट से ओंठ व दांत काले कर चेहरे पर अनियमित जीवनचर्या के कारण पीलापन ला उदास व निस्तेज सा हो गया है। असमय बाल पक जाना, आंखों के नीचे गड्ढे पड़ जाना, चेहरे से मुस्कुराहट चली जाना, यह सब सामान्य लक्षण ही बनते जा रहे हैं, जिन्हें देखकर आश्चर्य होता है, कि क्या ये वही लोग हैं जो अपने गोत्र का उच्चारण करते समय किसी ऋषि का नाम लेते हैं, क्या बचा है, इन लोगों में उन महानतम ऋषियों का? कहां है उनका वह ओज, कहां है उनकी वह उदारता, और कहां है उनके जैसा शरीर सौष्ठव? इस युग में 6 फीट की लम्बाई होना ही अपने आप में दुर्लभ हो गया है, जबकि हमारे आर्य पूर्वज तो सामान्य रूप से सात फीट के होते ही थे और यह औसत लम्बाई जो आज सिमट कर पांच फीट दो इंच के आस-पास रह गई है, आने वाली पीढि़यों में तो और भी घटती जा रही है।
इसका कारण है, आज का दूषित वातावरण, समय के अत्यधिक पूर्व मिल जाने वाला यौन, ज्ञान, चाहे वह सड़क पर लगे पोस्टरों से मिले या फुटपाथ पर फैली किताबों से या टी-वी- से। असमय की कृप्रवृत्तियों में लगकर लोग जीवन के उस तत्व को खो देते हैं जिसे ‘वीर्य’ कहते हैं जो कि जीवन का सारभूत तत्व है। जिसके अभाव से व्यक्ति के अन्दर शून्यता ही बचती है, इसी का फिर भविष्य में परिणाम होता है कि व्यक्ति विवाह के उपरान्त अनेक दुर्बलताओं से ग्रस्त होकर अपनी पत्नी को सम्भोग में सन्तुष्ट नहीं कर पाता। पत्नी की अतृप्ति ही गृह कलह और तनाव का वातावरण देकर जीवन विषाक्त कर देती है। सत्य भी हे कि यदि आप अपनी पत्नी को कामक्रीड़ा में सन्तुष्ट नहीं कर पायेंगे तो आपके जीवन के साथ ही साथ आपकी पत्नी का जीवन भी भार स्वरूप ही रहेगा।
सौन्दर्य, बल, क्षमता तो ऐसी होनी चाहिए कि आपके चेहरे पर झलकती जवानी की गुलाबी आभा को देखकर स्त्री स्वयं दीवानी बन जाये और आपके आगे पीछे घूमने को बाध्य हो जाय। दम-खम, पौरूषता से भरे लबालब शरीर में, जिसकी चौड़ी कलाइयाँ कुछ भी उमेठ कर रख देने की सगर्व घोषणा सी करती लगें। शक्ति को अपने भीतर मजबूती से जबड़े भींच कर प्रकट करता चेहरा हो और जवानी में ओंठ एक दूसरे के ऊपर मजबूती से चिपक जायं तो उसे देखकर कौन युवती आतुर नहीं हो उठेगी उन ओठों के रस का पान करने के लिए, फिर शुरू होगी आपके आस-पास मंडराने की क्रियाएं, इशारे, निगाहों के आमंत्रण और निगाहों से ही नहीं बातों से भी घुमा-फिरा कर आमन्त्रण। इस जीवन में तब सुख भोगने का दांव आपके पास होगा। सौन्दर्य को भोग करने वाला व्यक्ति ही इस जीवन में सफल हो सकता है क्योंकि सौन्दर्य भोग से ही उसके अन्दर आत्मविश्वास पुष्ट हो उठता है। सौन्दर्य भोग में गिड़गिड़ा कर ही नहीं, वरन सौन्दर्य ही सामने आकर गिड़गिडाये।
परशुराम तंत्र के अनुसार जीवन में यह सब कल्पना की बाते ही नहीं, वरन् साकार रूप भी ले सकती हैं, यदि इस जीने की बारीकियों को, साधना पक्ष में पहलुओं को समझा जाय तो। अनेकानेक साधना पद्धतियों से जो ‘रस’ की साधना है उसका नाम है ‘अनंग साधना’ जिसे सफलता पूर्वक सम्पन्न कर व्यक्ति नवजीवन और नव यौवन तो प्राप्त कर ही सकता है अपनी खोई हुई ताकत और जवानी की सनसनी से भरा शरीर भी पा सकता है साथ ही यदि वह नियमित रूप से साधना में प्रवृत्त रहे तो इस शरीर के आन्तरिक व बाह्य रूप का कायाकल्प भी कर सकता है। -जीवन में नवजीवन का उपाय है-
व्यक्ति के लिए आवश्यक नहीं कि वह अपने ढीले पड़ गये शरीर को पुनः वही जोश व ताजगी देने के लिए आयुर्वेद के उपाय भी प्रामाणिक होते हैं किन्तु उन्हें अब पूर्णता से समझ कर जीवन में उतारने का धैर्य व्यक्ति में नहीं बचा है। आयुर्वेदिक उपायों में व्यक्ति के शरीर की संरचना के अनुकूल औषधि प्रदान करना भी योग्य वैद्य द्वारा ही संभव है, और कोई आवश्यक ही नहीं कि आपको अपने स्थान के आसपास अनुभवी वैद्य मिल ही जाय। इसके विपरीत साधना प्रयोगों में ऐसी कोई बाध्यता नहीं होती, इसमें किसी भी प्रकार का कोई बन्धन नहीं होता और सामान्य पढ़ा लिखा व्यक्ति भी सफलता पूर्वक इन प्रयोगों को अपना कर अपने जीवन में सुखद व मनोनुकूल परिवर्तन ला सकता है।
जीवन में ‘काम’ कोई अश्लील स्थिति नहीं है और पूर्ण स्वस्थ पुरूष व स्त्री के मिलन में जिस सुख की उत्पत्ति होती है वह अपने आप में जीवन के मधुरतम क्षण होते हैं। जीवन के सर्वाधिक महत्वपूर्ण किन्तु प्रायः उपेक्षणीय और अछूते पक्ष को जहां तक साधना पूर्णता से स्पर्श करती है और व्यक्ति को न केवल शारीरिक रूप से सौन्दर्यवान, सबल और दर्शनीय बनाती है, अपितु वह उसके मन में कामकला के अनेक भेद भी स्वतः स्पष्ट होने लगते हैं। ‘अनंग’ अर्थात् कामदेव ही पुरुष में आकर समाहित हो जाय तो उसके जीवन में न्यूनता ही क्या रह सकती है? कामदेव की यह विशिष्ट साधना जिस साधक को सिद्ध हो जाती है, उसे अप्सरा साधना, किन्नरी साधना अथवा यक्षिणी सिद्ध करने में कोई विशेष प्रयास नहीं करना पड़ता, क्योंकि यह वर्ग ही आतुर हो उठते हैं ऐसे सिद्ध साधक के शरीर में समाहित होने का।
जीवन में मधुरता घोलने की इस विशेष साधना में कोई भी जटिलता नहीं है। इस साधना में जो आवश्यक तत्व है वह यह है कि आपके मन में विश्वास और आनन्द हो कि अब आपको अपने जीवन में नवयौवन घोलने का एक अवसर मिल रहा है, होता यह है कि जिस क्षण हम आनन्द युक्त होकर साधना करते हैं उन क्षणों में हमारे शरीर के तन्तु इस प्रकार जुड़े होते है कि सम्बन्धित मंत्र जप का सीधा प्रवाह ग्रहण कर लेते हैं। यह सीधा प्रवाह ग्रहण करना ही जीवन में अनुकूल परिवर्तन व साधना में सफलता का आधार होता है।
-साधाना इस प्रकार से ही करे-
यह साधना केवल शनिवार या बुधवार को ही की जा सकती है। रात्रि के 10 बजे के पश्चात् शांत व एकान्त कक्ष में वातावरण को सुसज्जित एवं सुगन्धित करें। श्रेष्ठ वस्त्र पहिन कर, स्वयं भी इत्र लगायें और यदि संभव हो तो गुलाब के फूलों की माला पहनें। सामने स्थापित ‘अनंग यंत्र’ पर पुष्प, गुलाल, अक्षत, केशर व इत्र चढ़ाकर आप अपनी जिस प्रकार की भी दुर्बलता से मुक्ति पाना चाहें, उसकी स्पष्ट शब्दों में प्रार्थना करें व निम्न मंत्र का जप ‘कामदेव माला’ से करें। यह माला ही अपने आप में पूर्ण रूप से एक सिद्धि है जिसे व्यक्ति धारण कर निरन्तर अपने अन्दर यौवन की ऊष्मा का प्रभाव बनाये रख सकता है। इस साधना में प्रयुक्त किया जाने वाला मंत्र है।मंत्र।। ऊँ ह्लौं ह्लूं कामदेवाय पूर्ण पूर्ण अनंगाय फट्।। (Om Hloum Hlom Kaamdevaay Poorn Poorn Anagaay Phat)
इस साधना में चार लघु नारियलों की आवश्यकता रहती है, जो जीवन में चार पुरुषार्थों के प्रतीक हैं। मंत्र जप के उपरान्त पुष्प की पखुडि़यों से इनका पूजन कर इन्हें पीले वस्त्र में बांध कर अपने शयन कक्ष के चारों कोनों में एक-एक लघु नारियल स्थापित कर देना चाहिए। इस साधना में उपरोक्त मंत्र की केवल ग्यारह माला मंत्र जप करना पर्याप्त होता है। यदि यह मंत्र जप व्यक्ति निरन्तर कर सके तो उत्तम रहता है अन्यथा चार शनिवार तक इस साधना क्रम को दोहराते रहें। अनुष्ठान पूर्ण होने के बाद चारों लघु नारियल, यंत्र व माला पीपल के वृक्ष के नीचे रख दें।कामदेव गायत्री मंत्र।। ऊँ कामेदवाय विद्महे पुष्प बाणाय अनंग-रतै धीमहि तन्नो अनगः प्रचोदयात्।।
अनंग साधना का ही पूरक है ‘काम गायत्री साधना’ व्यक्ति नित्य प्रति प्रातः स्नान के पश्चात् उपरोक्त काम गायत्री मंत्र की एक माला जप अवश्य करे। इस मंत्र जप से साधक का फल द्विगुणित हो जाता है।
अनंग साधना एक ऐसी साधना है जिसमें चमत्कार की आशा करना व्यर्थ है क्योंकि यह तो शरीर के अणुओं का सुसंयोजन करने की एक प्रक्रिया है जो एक दम से घटित नहीं हो सकती। जिन साधको ने धैर्य पूर्वक अपने को इस साधना में प्रवृत रखा है उनका अनुभव है कि इससे न केवल बालों में सधनता, बालों का काला हो जाना, आंखों में चमक बढ़ जाना, झुर्रियों का मिट जाना जैसे छोटे-मोटे परिवर्तन भी संभव होते हैं, वरन कद-काठी का भी आकार प्रकार बदलने लगता है और व्यक्ति जीवन में पूर्ण वैवाहिक सुख भोगने के साथ-साथ समाज में भी अपना विशिष्ट स्थान बनाने में सफल होता हैं।
सौन्दर्य, बल, क्षमता से ओत-प्रोत आपके चेहरे पर झलकती जवानी की गुलाबी आभा को देखकर सभी आपके आगे पीछे घूमने को बाध्य हो जाय। पांच पत्रिका सदस्य बनाने पर आपको कामदेव अनंग शक्ति दीक्षा व साधना सामग्री उपहार स्वरूप प्रदान की जायेगी। अधिक जानकारी के लिए कैलाश सिद्धाश्रम जोधपुर पर सम्पर्क करे।

