सांपुटिक श्रीसूक्त

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सांपुटिक श्रीसूक्त

प्रतिदिन सिर्फ एक पाठ मात्र से ही दरिद्रता का विनाश हो जाता है। प्रतिदिन या हर शुक्रवार को दाड़िम के रस से और इक्षुरस से इस सम्पुटित श्रीसूक्त का एक पाठ से अभिषेक करे। माँ लक्ष्मी को प्रसन्न कर के दरिद्रता का विनाश करने का ये सर्वोत्तम उपाय है

🪷यह सूक्त तीनसौ गुना फलदेने वाला है क्योंकि इस श्रीसूक्त को दुर्गासप्तशती के चतुर्थ अध्याय के 🌹”दुर्गे स्मृता हरसि” मंत्र के साथ लक्ष्मीजी का मूल सत्ताईस अक्षरों वाला मंत्र
🌹”ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः” इस मंत्र के साथ श्रीसूक्त के हर एक मन्त्र को सम्पुटित किया गया है इसलिये इस सूक्त की शक्ति तीनसौ गुना बढ़ जाती है।

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 इस सूक्त की खासियत यह है की इसमें नही विनियोग न्यास-संकल्प आदि करने की जरुरत है यह सिर्फ पाठ करने मात्र से ही फल देने लगता है। अगर आप ज्यादा दरिद्रता से जूझ रहे हो तो प्रतिदिन पूर्ण श्रद्धा भक्ति युक्त 9 पाठ करें 

फलप्राप्ति अवश्य होती है।

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साम्पुटिक_श्रीसूक्तपाठ

ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः।
ॐ दुर्गे स्मृता हरसिभीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि।
ॐ हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्ण रजतस्रजां ।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह।।
दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता।

ॐ दुर्गे स्मृता हरसिभीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभं ददासि।
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः।
ॐ तां म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीं।
यस्यां हिरण्यं विन्देयं गामश्वं पुरुषानहं।।
दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता।
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः।
ॐ दुर्गे स्मृता हरसीभीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि।
ॐ अश्वपूर्वां रथमध्यां हस्तिनाद प्रबोधिनीं।
श्रियं देवी मुपह्वये श्रीर्मा देवी जुषतां।।
दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता।
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः।
ॐ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि।
ॐ कां सोस्मितां हिरण्यप्राकारामार्द्रां ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीं।
पद्मेस्थितां पद्मवर्णां तामिहो पह्वये श्रियं ।।
दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता।
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः।
ॐ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि।
ॐ चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं श्रियम लोके देवजुष्टामुदारां।
तां पद्मिनीमीं शरणमहं प्रपद्ये अलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणे।।
दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता।
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः |
ॐ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि |
ॐ आदित्यवर्णे तपसोधिजातो वनस्पतिस्तव वृक्षोथबिल्वः |
तस्यफलानि तपसानुदन्तु मायान्त रायाश्च बाह्या अलक्ष्मीः ||
दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता |
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः |
ॐ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि |
ॐ उपैतु मां देवसखः कीर्तिश्च मणिना सह |
प्रादुर्भूतो सुराष्ट्रेस्मिन कीर्तिमृद्धिं ददातु में ||
दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता |
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः |
ॐ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि |
ॐ क्षुत्पिपासामलां ज्येष्ठामलक्ष्मीं नाशयाम्यहं |
अभूतिमसमृद्धिं च सर्वां निर्णुद में गृहात ||
दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता |
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः |
ॐ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि |
ॐ गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करिषिणिं |
ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोपह्वये श्रियं ||
दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता |
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः |
ॐ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि |
ॐ मनसः काममाकूतिं वाचः सत्यमशीमहि |
पशूनां रूप मन्नस्य मयी श्रीः श्रयतां यशः ||
दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता |
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः |
ॐ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि |
ॐ कर्दमेन प्रजा भूता मयी संभव कर्दम |
श्रियं वासय में कुले मातरं पद्ममालिनीं ||
दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकारण्य सदार्द्रचित्ता |
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः |
ॐ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि |
ॐ आपः सृजन्तु स्निग्धानि चिक्लीत वस् में गृहे |
नि च देविं मातरं श्रियं वासय में कुले ||
दरिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्दचित्ता |
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः |
ॐ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि |
ॐ आर्द्रां यः करिणिं यष्टिं सुवर्णां हेममालिनीं |
सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह ||
दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता |
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः |
ॐ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि |
ॐ आर्द्रां पुष्करिणिं पुष्टिं पिंगलां पद्ममालिनीं |
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह ||
दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता |
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः |
ॐ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि |
ॐ तां म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीं |
यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो दास्योश्वान विन्देयं पुरुषानहं |
दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता |

ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः।
ॐ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि।
ॐ यः शुचिः प्रयतो भूत्वा जुहयादाज्यमन्वहं।
सूक्तं पञ्चदशर्चं च श्री कामः सततं जपेत ।।
दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता।
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः।
ॐ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि।

।मश्री महालक्ष्मयार्पणं अस्तु।।

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