श्रावण मास शिव साधन पाशुपतास्त्रेय साधना
Shiva Sadhana Pashupatastreya Sadhana
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*साधनाओं में पूर्ण सिद्धि व भाग्योदय के लिए
महाभारत के युद्ध से पूर्व श्रीकृष्ण ने अर्जुन को सलाह दी थी, 5. कि वह महाभारत में विजयी होना चाहता है, वह यदि कौरवों की असंख्य सेना पर सफलता पाना चाहता है, वह मृत्यु को जीतना चाहता है, और वह यदि जीवन में पूर्ण सफलता के साथ भाग्योदय चाहता है, तो भगवान शिव की पाशुपतास्त्रेय साधना के अलावा और कोई ऐसी साधना नहीं है, जो कि जीवन में पूर्णता दे सके।
पाशुपतास्त्रेय साधना के विषय में विश्वामित्र जैसे दुर्धर्ष ऋषि ने एक स्वर में स्पष्ट किया है, कि पाशुपतास्त्रेय साधना प्राप्त करना ही जीवन का सौभाग्य है। भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए, उनसे समस्त साधनाओं में सिद्धि और सफलता प्राप्त करने का वरदान प्राप्त करने के लिए यही प्रयोग श्रेष्ठ और श्रेयस्कर है।
1.ग्रह संयोगों एवं स्वयं के कर्म दोषों से साधनाओं में सिद्धि मिलते रह जाती है, उन सभी का प्रभाव भगवान पशुपति की कृपा से समाप्त हो जाता है, और अगले वर्ष भर के लिए कर्म दोषों व ग्रह नक्षत्रों का विपरीत प्रभाव लगभग नगण्य हो जाता है, जिससे किसी भी साधना में सफलता असन्दिग्ध हो जाती है।
2. भगवान शिव मोक्ष प्रदायक देवता हैं, इस साधना के प्रभाव से साधक का परलोक सुधर जाता है।
3. साधक को जीवन में कहीं पर भी असफलता, अपमान या पराजय नहीं देखनी पड़ती।
4. भगवान शिव भाग्य के अधिपति देवता हैं। जिन का भाग्योदय नहीं हो रहा हो या जिनका भाग्य कमजोर हो अथवा जीवन में कर्म भली प्रकार से सम्पन्न नहीं हो रहे हों, उन्हें अवश्य भगवान शिव की यह साधना सम्पन्न करनी चाहिए।
5. इस साधना को यदि पूर्ण श्रद्धा और भक्ति के साथ सम्पन्न किया जाए, तो भगवान शिव के अत्यंत भव्य दर्शन भी साधक को प्राप्त हो जाते हैं, जिससे साधक के सभी मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं।
इस साधना को यदि पूर्ण श्रद्धा और भक्ति के साथ सम्पन्न किया जाए, तो भगवान शिव के अत्यंत भव्य दर्शन भी साधक को प्राप्त होते हैं, जिससे साधक के सभी मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं।
इस साधना में नर्मदेश्वर शिव लिंग की मुख्य रूप से आवश्यकता होती है। इसको बेल पत्र का आसन देकर किसी पात्र में स्थापित कर निम्न ध्यान मंत्र करें –
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ॐ ध्यायेन्नित्यं महेशं रजत गिरि निभं चारु चन्द्रावतंसं, रत्नाकल्पोज्ज्वलांगं परशु मूग वराभीति हस्तं प्रसन्नं।
पद्मासीनं समन्तात् स्तुतममर गणैर्व्याघ्र कृत्तिं वसानं, विश्वाघंविश्ववन्द्यंनिखिल भय हरं पंच वक्त्रं त्रिनेत्रं ।।
अब अपने सिर पर एक पुष्प रखें तथा नर्मदेश्वर शिवलिंग के सामने भी एक पुष्प रखकर अपने और शिव के परस्पर प्राण संबंध स्थापित करते हुए निम्न उच्चारण करें।
पिनाक धृक् इहावह इहावह, इह तिष्ठ इह तिष्ठ, इह सन्निधेहि इह सन्निधेहि, इह सन्निधतत्रस्व, यावत् पूजां करोम्यहं। स्थानीयं पशुपतये नमः।
इसके बाद रुद्रयामल तंत्र के अनुसार रुद्राक्ष माला से निम्न मंत्र की 21 माला मंत्र जप करें –
।। ॐ हर, महेश्वर, शूलपाणि, पिनाक धृक, पशुपति, शिव महादेव ईशान नमः शिवाय।।
यह सम्पूर्ण प्रकार की सफलता देने वाला मंत्र है और इसके माध्यम से पूर्ण सिद्धि प्राप्त होती है। शास्त्रों में इसे अष्टाष्ट मंत्र या अष्ट शिव मंत्र कहते हैं जो अपने आपमें अद्वितीय है। प्रयोग समाप्ति के बाद आरती करें। बाद में रुद्राक्ष माला व नमर्देश्वर शिवलिंग को पूजा स्थान में स्थापित कर दें।
Shiva Sadhana
Pashupatastreya Sadhana
||Om Har, Maheshwara, Shulpani, Pinaka Dhek Pashupati ,Shiva Mahadeva , Ishan Namah:Shivaya ||
Mahadeva Pashupatastreya Sadhana
For complete perfection and fortune in the sadhana
Before the battle of Mahabharata, Krishna advised Arjuna that Yavi wants to be victorious in Mahabharata, if he wants to succeed on the Kauravas, if he wants to conquer death, if he wants fortune with complete success in life, Lord Shiva can give perfection in life.
of ‘There is no such sadhana other than the Pashupatastreya sadhana, which
Even a formidable sage like Vishvamitra had to perform penance for five thousand years to attain the Pashupatastreya sadhana. A sage like Markandeya has made it clear in one voice, that attaining Pashupatastreya Sadhana is the fortune of life. To please Lord Shiva, to obtain from Him the boon of attaining perfection and success in all sadhana is the best and the best.
The Shiva Purana mentions several benefits of this Pashupat experiment performed in the month of Shravan:
- Siddhi in sadhana remains mixed with planetary conjunctions and own karma doshas, all their side effects are eliminated by the grace of Lord Pashupati, and the adverse effect of his karma doshas and planetary constellations becomes almost negligible for the next year, ensuring success in any sadhana.
- Lord Shiva is the God who gives salvation. The effect of this sadhana makes the afterlife of the seeker beautiful.
- The seeker does not have to see failure, humiliation or defeat anywhere in life.
- Lord Shiva is the lord of fortune. Those whose fortunes are not rising or whose fortunes are weak or whose works in life are not being done well, they must perform the sadhana of Lord Shiva.
- If this sadhana is performed with complete faith and devotion, the seeker also attains the most magnificent vision of Lord Shiva, thus fulfilling all the desires of the seeker.
In this sadhana, place the Pashupatatreya Yantra in a vessel with a seat of bilva leaf and chant the following meditation mantra –
ॐ Dhyayetrityam Mahesham Rajata Giri Nirbha Charu Chandravata Sa
Ratnakalpa bright limbs ax deer boar fearful hand prasa lotus seated all around praised immortal gairvyaghra kritti wearing visvadya visva vanyam nikhila-bhaya-harapanch vaktra trinetra
Now place a flower on your head and also place a flower in front of the yantra and chant the following while establishing the mutual prana relationship between you and Shiva –
Pinaka dhruk ihavaha ihavaha, iha tishta iha liye iha sannidhehi iha sannidhehi, iha sannidhatasya yavat pooja karomyam. Ome to the local animal lord.
Then chant 21 rows of the following mantra with ‘Rudraya Mala’ according to ‘Rudrayamala Tantra’-
।। ॐ Har, Maheshwara, Shulapani, Pinaka Dhek Pashupati, Shiva, Mahadeva, Ishaana Namah Shivaya ॥
This is a mantra that gives all kinds of success and through it complete perfection is attained. In the scriptures it is called ‘Ashtashta Mantra’ or ‘Ashta Shiva Mantra’, which is unique in itself. After completion of the experiment, perform Aarti. Later, place the Rudraksha Mala and the Yantra in the place of worship.
||ॐ हर, महेश्वर, शूलपाणि, पिनाक धॆक् पशुपति ,शिव महादेव , ईशान नमः:शिवाय ||
महादेव पाशुपतास्त्रेय साधना
साधनाओं में पूर्ण सिद्धि व भाग्योदय के लिए
महाभारत के युद्ध से पूर्व श्रीकृष्ण ने अर्जुन को सलाह की यवि महाभारत में विजयी होना चाहता है, वह यदि कौरवों की या पर सफलता पाना चाहता है, वह यदि मृत्यु को जीतना चाहता है यदि जीवन में पूर्ण सफलता के साथ भाग्योदय चाहता है तो भगवान शिव कि जीवन में पूर्णता दे सके।
की ‘पाशुपतास्त्रेय साधना के अलावा और कोई ऐसी साधना नहीं है, जो
पाशुपतास्त्रेय साधना को प्राप्त करने के लिए विश्वामित्र जैसे दुर्धर्ष ऋषि को भी पांच हजार वर्ष तक तपस्या करनी पड़ी थी। मार्कण्डेय जैसे ऋषि ने एक स्वर में स्पष्ट किया है, कि पाशुपतास्त्रेय साधना प्राप्त करना ही जीवन का सौभाग्य है। भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए, उनसे समस्त साधनाओं में सिद्धि और सफलता प्राप्त करने का वरदान प्राप्त करने के लिए ही प्रयोग श्रेष्ठ और श्रेयस्कर है।
श्रावण मास में किए जाने वाले इस पाशुपत प्रयोग के ‘शिव पुराण’ में कई लाभ बताए गए हैं-
1. ग्रह संयोगों एवं स्वयं के कर्म दोषों से साधनाओं में सिद्धि मिलते-मिलते रह जाती है, उन सभी के दुष्प्रभाव भगवान पशुपति की कृपा से समाप्त हो जाते हैं, और अगले वर्ष भर के लिए उसके कर्म दोषों व ग्रह नक्षत्रों का विपरीत प्रभाव लगभग नगण्य हो जाता है, जिससे किसी भी साधना में सफलता निश्चित हो जाती है।
2. भगवान शिव मोक्ष प्रदायक देवता हैं, इस साधना के प्रभाव से साधक का परलोक सुघर जाता है।
3. साधक को जीवन में कहीं पर भी असफलता, अपमान या पराजय नहीं देखनी पड़ती।
4. भगवान शिव भाग्य के अधिपति देवता हैं। जिनका भाग्योदय नहीं हो रहा या जिनका भाग्य कमजोर हो अथवा जीवन में कार्य भली प्रकार से सम्पन्न नहीं हो रहे हों, तो उन्हें अवश्य ही भगवान शिव की साधना सम्पन्न करनी चाहिए।
5. इस साधना को यदि पूर्ण श्रद्धा और भक्ति के साथ सम्पन्न किया जाए, तो भगवान शिव के अत्यंत भव्य दर्शन भी साधक को प्राप्त हो जाते हैं, जिससे साधक के सभी मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं।
इस साधना में पाशुपतात्रेय यंत्र को बिल्व पत्र का आसन देकर कसी पात्र में स्थापित करें और निम्न ध्यान मंत्र करें –
ॐ ध्यायेत्रित्यं महेशं रजत गिरि निर्भ चारु चन्द्रावत स
रत्नाकल्पोज्जवलांग परशु मृग वराभीति हस्तं प्रस पद्मासीन समन्तात् स्तुतममर गैर्व्याघ्र कृत्तिं वसान विश्वाद्यं विश्व वन्यं निखिल-भय-हरपंच वक्त्रं त्रिनेत्र
अब अपने सिर पर एक पुष्प रखें तथा यंत्र के सामने भी एक पुष्प रखकर अपने और शिव के परस्पर प्राण संबंध स्थापित करते हुए निम्न उच्चारण करें –
पिनाक धृक् इहावह इहावह, इह तिष्ठ इह लिए इह सन्निधेहि इह सन्निधेहि, इह सन्निधतस्य यावत् पूजां करोम्यहं। स्थानीयं पशुपतये नमः।
इसके बाद ‘रुद्रयामल तंत्र’ के अनुसार ‘रुद्राय माला’ से निम्न मंत्र की 21 माला मंत्र जप करें-
।। ॐ हर, महेश्वर, शूलपाणि, पिनाक धॆक् पशुपति, शिव, महादेव, ईशान नमः शिवाय ॥
यह सम्पूर्ण प्रकार की सफलता देने वाला मंत्र है और इसके माध्यम से पूर्ण सिद्धि प्राप्त होती है। शास्त्रों में इसे ‘अष्टाष्ट मंत्र’ या ‘अष्ट शिव मंत्र’ कहते हैं, जो अपने आपमें अद्वितीय है। प्रयोग समाप्ति के बाद आरती करें। बाद में रुद्राक्ष माला व यंत्र को पूजा स्थान में स्थापित करें।