Shiva Sadhana
Pashupatastreya Sadhana
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शिव साधना
पाशुपतास्त्रेय साधना
||ॐ हर, महेश्वर, शूलपाणि, पिनाक धॆक् पशुपति ,शिव महादेव , ईशान नमः:शिवाय ||
महादेव पाशुपतास्त्रेय साधना
साधनाओं में पूर्ण सिद्धि व भाग्योदय के लिए
महाभारत के युद्ध से पूर्व श्रीकृष्ण ने अर्जुन को सलाह की यवि महाभारत में विजयी होना चाहता है, वह यदि कौरवों की या पर सफलता पाना चाहता है, वह यदि मृत्यु को जीतना चाहता है यदि जीवन में पूर्ण सफलता के साथ भाग्योदय चाहता है तो भगवान शिव कि जीवन में पूर्णता दे सके।
की ‘पाशुपतास्त्रेय साधना के अलावा और कोई ऐसी साधना नहीं है, जो
पाशुपतास्त्रेय साधना को प्राप्त करने के लिए विश्वामित्र जैसे दुर्धर्ष ऋषि को भी पांच हजार वर्ष तक तपस्या करनी पड़ी थी। मार्कण्डेय जैसे ऋषि ने एक स्वर में स्पष्ट किया है, कि पाशुपतास्त्रेय साधना प्राप्त करना ही जीवन का सौभाग्य है। भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए, उनसे समस्त साधनाओं में सिद्धि और सफलता प्राप्त करने का वरदान प्राप्त करने के लिए ही प्रयोग श्रेष्ठ और श्रेयस्कर है।
श्रावण मास में किए जाने वाले इस पाशुपत प्रयोग के ‘शिव पुराण’ में कई लाभ बताए गए हैं-
1. ग्रह संयोगों एवं स्वयं के कर्म दोषों से साधनाओं में सिद्धि मिलते-मिलते रह जाती है, उन सभी के दुष्प्रभाव भगवान पशुपति की कृपा से समाप्त हो जाते हैं, और अगले वर्ष भर के लिए उसके कर्म दोषों व ग्रह नक्षत्रों का विपरीत प्रभाव लगभग नगण्य हो जाता है, जिससे किसी भी साधना में सफलता निश्चित हो जाती है।
2. भगवान शिव मोक्ष प्रदायक देवता हैं, इस साधना के प्रभाव से साधक का परलोक सुघर जाता है।
3. साधक को जीवन में कहीं पर भी असफलता, अपमान या पराजय नहीं देखनी पड़ती।
4. भगवान शिव भाग्य के अधिपति देवता हैं। जिनका भाग्योदय नहीं हो रहा या जिनका भाग्य कमजोर हो अथवा जीवन में कार्य भली प्रकार से सम्पन्न नहीं हो रहे हों, तो उन्हें अवश्य ही भगवान शिव की साधना सम्पन्न करनी चाहिए।
5. इस साधना को यदि पूर्ण श्रद्धा और भक्ति के साथ सम्पन्न किया जाए, तो भगवान शिव के अत्यंत भव्य दर्शन भी साधक को प्राप्त हो जाते हैं, जिससे साधक के सभी मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं।
इस साधना में पाशुपतात्रेय यंत्र को बिल्व पत्र का आसन देकर कसी पात्र में स्थापित करें और निम्न ध्यान मंत्र करें –
ॐ ध्यायेत्रित्यं महेशं रजत गिरि निर्भ चारु चन्द्रावत स
रत्नाकल्पोज्जवलांग परशु मृग वराभीति हस्तं प्रस पद्मासीन समन्तात् स्तुतममर गैर्व्याघ्र कृत्तिं वसान विश्वाद्यं विश्व वन्यं निखिल-भय-हरपंच वक्त्रं त्रिनेत्र
अब अपने सिर पर एक पुष्प रखें तथा यंत्र के सामने भी एक पुष्प रखकर अपने और शिव के परस्पर प्राण संबंध स्थापित करते हुए निम्न उच्चारण करें –
पिनाक धृक् इहावह इहावह, इह तिष्ठ इह लिए इह सन्निधेहि इह सन्निधेहि, इह सन्निधतस्य यावत् पूजां करोम्यहं। स्थानीयं पशुपतये नमः।
इसके बाद ‘रुद्रयामल तंत्र’ के अनुसार ‘रुद्राय माला’ से निम्न मंत्र की 21 माला मंत्र जप करें-
।। ॐ हर, महेश्वर, शूलपाणि, पिनाक धॆक् पशुपति, शिव, महादेव, ईशान नमः शिवाय ॥
यह सम्पूर्ण प्रकार की सफलता देने वाला मंत्र है और इसके माध्यम से पूर्ण सिद्धि प्राप्त होती है। शास्त्रों में इसे ‘अष्टाष्ट मंत्र’ या ‘अष्ट शिव मंत्र’ कहते हैं, जो अपने आपमें अद्वितीय है। प्रयोग समाप्ति के बाद आरती करें। बाद में रुद्राक्ष माला व यंत्र को पूजा स्थान में स्थापित करें।
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