Navgrah Kavach in Hindi

नवग्रह कवच (Navgrah Kavach) नौ ग्रहों (सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु, केतु) से सुरक्षा और सौभाग्य पाने के लिए एक शक्तिशाली स्तोत्र है, जिसमें विभिन्न ग्रहों से शरीर के अंगों और जीवन के विभिन्न पहलुओं की रक्षा की प्रार्थना की जाती है, जैसे सिर की रक्षा सूर्य से, बुद्धि की रक्षा बृहस्पति से, और यह पाठ रोग, भय, और दुर्भाग्य को दूर कर पुत्र, धन, और विजय दिलाता है
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मानव जीवन पर ग्रहों का प्रभाव सर्वाधिक पड़ता है. जीवन में सुख-दुख, लाभ -हानि ग्रहों की गति पर ही निर्भर होते हैं
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ग्रह अगर अनुकूल हों तो रंक से रजा बना देते हैं , प्रतिकूल हो जायें तो सड़को पे ले आते हैं. ग्रह प्रतिकूल हो तो देवतायों
को भी नहीं छोड़ते. राम पर दशा आई तो बनवास करवा दिया, कृष्ण पर आयी तो मथुरा छोडनी पड़ी और रणछोड़ कहलाये. . हर ग्रह अपने आप में देवता होता है इसी लिए हर यज्ञ, पूजा, अनुष्ठान आदि में नवग्रह की स्थापना अवश्य की जाती है.
हर मनुष्य की जन्म कुंडली में कुछ न कुछ ग्रह दोष होता ही है और उनका दोष जीवन में भोगना ही पड़ता है. ग्रह भी पुरे ९ है अब किस किस का दोष दूर करें? कभी शनि कि दशा , कभी राहू खराब , कभी मंगल टेडा तो कभी शुक्र नीच का . कई बार व्यक्ति ज्योतिषियों के चक्कर काटते-काटतेऔर विभिन् प्रकार के रत्न पहनते थक जाता है. क्या कोई ऐसी युक्ति नहीं की जिससे सभी ग्रह अनुकूल हो जाएँ? कोई ऐसा ज्ञान ,ऐसा मंत्र की जीवन में ग्रहों का विपरीत फल ना भुगतना पड़े और जीवन में सफलता ही सफलता हो?
Navgrah Kavach
भगवान शिव तो औघड़ दानी है. उन्होंने पार्वती को नवग्रह कवच के बारे में बताया कि जो भी मनुष्य इस कवच को धारण करेगा या इसका जप करेगा उसके जीवन में ग्रह बाधा नहीं आयेगी. जीवन में वह सब प्रकार के भौतिक सुख प्राप्त करेगा. पाठकों के लाभार्थ उस कवच को प्रदान किया जा रहा है. जिसका जप हर किसी को करना ही चाहिए .
ॐ ह्रां ह्रीं सः में शिरः पातु श्री सूर्य ग्रहपति,
ॐ घों सौं ओम में मुखं पातु श्री चंद्रो ग्रह रजकः,
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रां सः करो पातु श्री सेनापति कुजः
पयादथॐ ह्रौं ह्रां सः पदागयो नृप बालकः
ॐ त्रों त्रों त्रों सः कटी पातु मायादमर पूजित
ॐ ह्रौं ह्रां सः दैत्य पूज्य ह्रदयं परी रक्षतु
ॐ छौं छं छौं स: कंठ देशम श्री रहू देव मर्दक
ॐफौं फाम फौं सः कटी पातु सर्वांगम भीतो वतु
ग्रहशचेते भोग देहा नित्यअस्तु सफुटित ग्रह
एत दशांश संभूतं पातु नित्यम तु दुर्जनात
अक्षम कवचं पुण्यं सूर्यादि ग्रह देवतम पठेद व पाठयेद
वापी दारयेद यो जनः शुचिः
सः सिद्धिं प्राप्यु न धिषटाम दुर्लाभाम त्रि ध्शेसतुयाम
विधि:- इस को २ प्रकार से किया जा सकता है. एक अनुष्ठान के रूप में दूसरा नित्य पूजा के रूप में .
१. अनुष्ठान को किसी भी दिन शुरू किया जा सकता है. स्नान करके अपने पूजा के स्थान में नवग्रह कवच को स्थापित करें . इसको जल से स्नान करवाएं . अब इस पर कुमकुम से तिलक करें. थोड़े चावल (जो टूटे हुए ना हों ) चडा दें. अब इस पर पुष्प चडा दें. घी का दीपक जला दें , अगरबत्ती लगा दें . अब इस पाठ को १०८ बार करें और केवल ११ दिन करें . ११ दिन के बाद इस कवच को गले में पहन लें . इसके बाद रोज केवल एक या पांच बार इस मंत्र को जप लिया करें . कुंडली में केसा भी दोष हो वह खत्म हो जायेगा, जीवन में उन्नति के रास्ते खुलने शुरू हो जायेंगे. रोगों से निवृति मिलेगी,
२. अनुष्ठान ना करके यदि कवच को धारण करके मात्र पांच बार इस मंत्र को जप लिया जाये तो वह दिन सफलता पूर्वक निकलता है, उस दिन ग्रहों का कोई भी विपरीत प्रभाव उसे नहीं भोगना पड़ता.
मेरी राय में शिव प्रदत इस दुर्लभ मंत्र कि जप प्रत्येक व्यक्ति को करना चाहिए जिससे उसके जीवन से परेशानियां दूरे हो सकें .
|| ग्रहशांति शिव रक्षा स्तोत्रं ||
नमः शिवाय नित्यं मे, ग्रहदोषहराय च।
सर्वशान्तिप्रदं देवं, रक्ष रक्ष महेश्वर ॥१॥
रविग्रहे यदि क्रोधी, चन्द्रपीडा यदि भवेत् ।
शिवनामस्मृतिः शक्तिः, शान्तिं ददाति नित्यशः ॥२॥
मङ्गलदोषनाशाय, बुधशान्तिप्रदायिन ।
गुरुशुक्रादिदोषघ्न, रक्ष मां शङ्कर प्रभो ॥३॥
शनिदोषभयार्तस्य, राहुकेतुग्रहेपि च ।
शरणागतमेकं मां, पालय त्वं दिनं प्रति ॥४॥
कालसर्पविनाशाय, कुंडलीशुद्धिकारक ।
शिवस्तु परमं ब्रह्म, सर्वदोषहरः सदा ॥५॥
गृहपीडा, ग्रहशापः, वास्तुदोषसमुद्भवः ।
हरस्व यद्यहं नित्यं, पठेयं ते स्तवं विभो ॥६॥
संतानविघ्ननाशाय, वैरिभीति-विनाशन।
शिवकवचयुक्तं मे, स्तोत्रं भवतु दायकम् ॥७॥
नवग्रहैश्च यदि क्लेशो, यंत्रतंत्रविकारकः ।
भवबन्धविनाशाय, रक्ष मां शम्भु सर्वदा ॥८ ॥
शिवध्यानं शिवस्तोत्रं, यः पठेत् श्रद्धयान्वितः ।
तस्य सर्वग्रहाः शान्ताः, पीडाः नश्यन्ति तत्क्षणम् ॥९॥
दुःस्वप्नं च ग्रहविपत्तिः, वंशदोषसमुद्भवम् ।
स्तोत्रपाठेन शम्भोस्तु, सर्व क्षिप्रं विनश्यति ॥१०॥
एतत्तु ग्रहशान्त्यर्थ, शिवस्तोत्रं दिवानिशम् ।
यः पठेत् स भवेन्नित्यं, ग्रहदोषविवर्जितः ॥११॥